| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 31: सुग्रीव पर लक्ष्मण का रोष, लक्ष्मण का किष्किन्धा के द्वार पर जाकर अङ्गद को सुग्रीव के पास भेजना, प्लक्ष और प्रभाव का सुग्रीव को कर्तव्य का उपदेश देना » श्लोक 32-34 |
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| | | | श्लोक 4.31.32-34  | सोऽङ्गदं रोषताम्राक्ष: संदिदेश महायशा:।
सुग्रीव: कथ्यतां वत्स ममागमनमित्युत॥ ३२॥
एष रामानुज: प्राप्तस्त्वत्सकाशमरिंदम।
भ्रातुर्व्यसनसंतप्तो द्वारि तिष्ठति लक्ष्मण:॥ ३३॥
तस्य वाक्यं यदि रुचि: क्रियतां साधु वानर।
इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ वत्स वाक्यमरिंदम॥ ३४॥ | | | | | | अनुवाद | | क्रोध से लाल-लाल नेत्रों वाले यशस्वी लक्ष्मण ने अंगद को आदेश दिया- 'पुत्र! सुग्रीव को मेरे आगमन की सूचना दो। उनसे कहो- शत्रुदमन वीर! श्री रामचन्द्र के छोटे भाई लक्ष्मण अपने भाई के शोक से दुखी होकर तुम्हारे पास आये हैं और नगर के द्वार पर खड़े हैं। वानरराज! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो उनकी आज्ञा का विधिपूर्वक पालन करो। शत्रुदमन पुत्र अंगद! इतना कहकर शीघ्र ही मेरे पास लौट आओ।' | | | | With his eyes turning red with anger, the famous Lakshman ordered Angad- 'Son! Inform Sugreeva about my arrival. Tell him- Shatrudaman Veer! Shri Ramchandra's younger brother Lakshman has come to you, saddened by his brother's sorrow, and is standing at the city gate. Monkey King! If you wish, then obey his orders properly. Shatrudaman son Angad! Saying this much, return to me soon.' | | ✨ ai-generated | | |
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