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ramayan 4.31.30: इतना ही नहीं, वह पाँच मुँह वाले सर्प के समान दिखाई देने लगा। बाण की नोक सर्प की फड़फड़ाती हुई जीभ, धनुष उसका विशाल शरीर और सर्परूपी लक्ष्मण उसके तेजस्वी विष से व्याप्त हो गए।   |   ramayan सर्ग 4.31: सुग्रीव पर लक्ष्मण का रोष, लक्ष्मण का किष्किन्धा के द्वार पर जाकर अङ्गद को सुग्रीव के पास भेजना, प्लक्ष और प्रभाव का सुग्रीव को कर्तव्य का उपदेश देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 31: सुग्रीव पर लक्ष्मण का रोष, लक्ष्मण का किष्किन्धा के द्वार पर जाकर अङ्गद को सुग्रीव के पास भेजना, प्लक्ष और प्रभाव का सुग्रीव को कर्तव्य का उपदेश देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.31.30 
बाणशल्यस्फुरज्जिह्व: सायकासनभोगवान्।
स्वतेजोविषसम्भूत: पञ्चास्य इव पन्नग:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इतना ही नहीं, वह पाँच मुँह वाले सर्प के समान दिखाई देने लगा। बाण की नोक सर्प की फड़फड़ाती हुई जीभ, धनुष उसका विशाल शरीर और सर्परूपी लक्ष्मण उसके तेजस्वी विष से व्याप्त हो गए।
 
Not only this, he started looking like a five-headed serpent. The tip of the arrow appeared to be the snake's flickering tongue, the bow was its huge body and Lakshmana in the form of a serpent was permeated with his radiant poison.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)