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ramayan 4.30.67-68: सौम्य लक्ष्मण! मैं अनाथ हूँ। मुझे मेरे राज्य से निकाल दिया गया है। रावण ने मेरा अपमान किया है। मैं दरिद्र हूँ। मेरा घर यहाँ से बहुत दूर है। मैं यहाँ किसी कामना से आया हूँ और सुग्रीव भी जानता है कि राम मेरी शरण में आए हैं। इन्हीं सब कारणों से दुष्ट बुद्धि वाले वानरराज सुग्रीव मेरा अपमान कर रहे हैं; किन्तु वे यह नहीं जानते कि मैं अपने शत्रुओं को सदैव पीड़ा पहुँचाने में समर्थ हूँ। 67-68   |   ramayan सर्ग 4.30: शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 30: शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना  »  श्लोक 67-68
 
 
श्लोक  4.30.67-68 
अनाथो हृतराज्योऽहं रावणेन च धर्षित:।
दीनो दूरगृह: कामी मां चैव शरणं गत:॥ ६७॥
इत्येतै: कारणै: सौम्य सुग्रीवस्य दुरात्मन:।
अहं वानरराजस्य परिभूत: परंतप:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
सौम्य लक्ष्मण! मैं अनाथ हूँ। मुझे मेरे राज्य से निकाल दिया गया है। रावण ने मेरा अपमान किया है। मैं दरिद्र हूँ। मेरा घर यहाँ से बहुत दूर है। मैं यहाँ किसी कामना से आया हूँ और सुग्रीव भी जानता है कि राम मेरी शरण में आए हैं। इन्हीं सब कारणों से दुष्ट बुद्धि वाले वानरराज सुग्रीव मेरा अपमान कर रहे हैं; किन्तु वे यह नहीं जानते कि मैं अपने शत्रुओं को सदैव पीड़ा पहुँचाने में समर्थ हूँ। 67-68
 
Soumya Lakshman! I am an orphan. I have been disowned from my kingdom. Ravana has insulted me. I am poor. My home is far away from here. I have come here with a desire and Sugreev also understands that Ram has come to my refuge. Due to all these reasons, the evil-minded Sugreev, the king of monkeys, is insulting me; but he does not know that I am always capable of causing pain to my enemies. 67-68.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)