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श्लोक  4.30.58 
दर्शयन्ति शरन्नद्य: पुलिनानि शनै: शनै:।
नवसंगमसव्रीडा जघनानीव योषित:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जैसे-जैसे पानी कम होता जाता है, शरद ऋतु की नदियाँ धीरे-धीरे अपने नंगे किनारों को उजागर करती जाती हैं। ठीक वैसे ही जैसे शर्मीली लड़कियों को अपने पहले संभोग के दौरान धीरे-धीरे अपने जघन क्षेत्र को उजागर करने के लिए मजबूर किया जाता है।
 
‘The rivers of autumn are gradually exposing their bare banks as the water recedes. Just like shy girls are forced to gradually expose their pubic area during their first sexual intercourse.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)