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श्लोक 4.30.55  |
सचक्रवाकानि सशैवलानि
काशैर्दुकूलैरिव संवृतानि।
सपत्ररेखाणि सरोचनानि
वधूमुखानीव नदीमुखानि॥ ५५॥ |
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| अनुवाद |
| नदियों के मुख नववधू के मुखों के समान प्रतीत होते हैं। उनमें स्थित चक्रवाक गोरोचन के तिलक के समान प्रतीत होते हैं, सेवार वधू के मुख पर लगी हुई पत्रभंगी के समान प्रतीत होते हैं और काश (एक प्रकार की राख) नदी रूपी वधू के मुख को ढकने वाले श्वेत दुपट्टे के समान प्रतीत होते हैं।॥ 55॥ |
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| ‘The mouths of the rivers look like the faces of new brides. The chakravakas in them look like a tilak made of gorochana, the sewaars look like the patrabhangi made on the face of the bride and the kaash (a kind of ash) look like white shawls covering the face of the bride in the form of a river.॥ 55॥ |
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