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श्लोक 4.30.22  |
तर्पयित्वा सहस्राक्ष: सलिलेन वसुंधराम्।
निर्वर्तयित्वा सस्यानि कृतकर्मा व्यवस्थित:॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| सुमित्रानन्दन! इस पृथ्वी को जल से संतृप्त करके तथा इसके अन्न को पकाकर अब सहस्र नेत्रों वाला इन्द्र तृप्त हो गया है॥22॥ |
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| Sumitranandan! The thousand-eyed Indra has now become gratified by saturating this earth with water and cooking its grains. 22॥ |
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