श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 30: शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  4.30.19-20 
सलक्षणं लक्ष्मणमप्रधृष्यं
स्वभावजं वाक्यमुवाच राम:।
हितं च पथ्यं च नयप्रसक्तं
ससामधर्मार्थसमाहितं च॥ १९॥
निस्संशयं कार्यमवेक्षितव्यं
क्रियाविशेषोऽप्यनुवर्तितव्य:।
न तु प्रवृद्धस्य दुरासदस्य
कुमार वीर्यस्य फलं च चिन्त्यम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण उत्तम गुणों से संपन्न थे। उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था। भगवान् श्री राम ने उनसे यह स्वाभाविक बात कही- 'कुमार! तुमने जो कहा है, वह वर्तमान समय में तो कल्याणकारी है ही, भविष्य में भी सुख देने वाला है, राजनीति के लिए सर्वथा अनुकूल है और शांति के साथ-साथ धर्म और अर्थ से भी संयुक्त है। निश्चय ही सीता के अनुसंधान के कार्य पर ध्यान देना चाहिए और उसके लिए कोई विशेष कार्य या विधि भी अपनानी चाहिए; परंतु प्रयत्न छोड़कर केवल उस दुर्लभ एवं पूर्ण रूप से बढ़े हुए शक्तिशाली कार्य के फल पर ही दृष्टि रखना उचित नहीं है।'॥19-20॥
 
Lakshmana was blessed with excellent qualities. No one could defeat him. Lord Shri Ram said this natural thing to him- 'Kumar! What you have said is beneficial in the present time, will also bring happiness in the future, is completely favorable for politics and is combined with peace as well as religion and wealth. Certainly, attention should be paid to the work of researching Sita and a special work or method should also be adopted for it; but it is not right to give up the effort and keep eyes only on the result of the rare and powerful work that has increased completely.'॥19-20॥
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