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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 30: शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.30.17 
क्रियाभियोगं मनस: प्रसादं
समाधियोगानुगतं च कालम्।
सहायसामर्थ्यमदीनसत्त्व:
स्वकर्महेतुं च कुरुष्व तात॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! आप आवश्यक कर्तव्यों के पालन में पूरी तरह तत्पर रहें, मन को प्रसन्न रखें और हर समय एकाग्रता बनाए रखें। साथ ही, अपने हृदय में विनम्रता को स्थान न देते हुए, अपने पराक्रम को बढ़ाने के लिए सहायता लेने और अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयत्न करें।
 
‘Father! You should completely devote yourself to the observance of the necessary duties, keep your mind happy and maintain concentration at all times. Also, without giving place to humility in your heart, try to seek help and increase your strength to increase your valour.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)