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श्लोक  4.30.11 
सरांसि सरितो वापी: काननानि वनानि च।
तां विना मृगशावाक्षीं चरन्नाद्य सुखं लभे॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हाय! मैं नदी, तालाब, जलाशय, वन और वन में घूमता हूँ; किन्तु मृग-कन्या के समान नेत्रों वाली उस सीता के बिना मुझे कहीं भी सुख नहीं मिलता।
 
Alas! I roam all over the rivers, ponds, reservoirs, forests and woods; but I find no happiness anywhere without that Sita with the eyes of a fawn.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)