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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 3: हनुमान जी का श्रीराम और लक्ष्मण से वन में आने का कारण पूछना और अपना तथा सुग्रीव का परिचय देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.3.33 
अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया।
कस्य नाराध्यते चित्तमुद्यतासेररेरपि॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हृदय, कंठ और मस्तिष्क तीनों स्थानों से स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होने वाली इस विचित्र वाणी को सुनकर किसका मन प्रसन्न नहीं होगा? तलवार उठाकर किसी को मारने के लिए तत्पर शत्रु का भी हृदय इस अद्भुत वाणी से परिवर्तित हो सकता है।
 
Whose mind will not be pleased after listening to this strange voice which is clearly expressed through the three places- heart, throat and head. Even the heart of the enemy who is ready to kill someone with his sword raised can be changed by this wonderful voice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)