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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 3: हनुमान जी का श्रीराम और लक्ष्मण से वन में आने का कारण पूछना और अपना तथा सुग्रीव का परिचय देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.3.2 
कपिरूपं परित्यज्य हनुमान् मारुतात्मज:।
भिक्षुरूपं ततो भेजे शठबुद्धितया कपि:॥ २॥
 
 
अनुवाद
यह सोचकर कि कोई भी उनके वानर रूप पर विश्वास नहीं करेगा, पवनपुत्र हनुमान ने उस रूप को त्याग दिया और एक भिक्षुक (साधारण तपस्वी) का रूप धारण कर लिया।
 
Thinking that no one would believe in his ape form, Hanuman, the son of the wind, abandoned that form and assumed the form of a mendicant (ordinary ascetic).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)