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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  4.28.64 
उपकारेण वीरो हि प्रतीकारेण युज्यते।
अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मन:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
"किसी की कृपा से लाभान्वित होने वाला वीर पुरुष बदले में कुछ करके उपकार का बदला चुकाता है; किन्तु यदि कोई उपकार की उपेक्षा कर दे या उसे भूल जाए तथा बदले में कुछ करने से विमुख हो जाए, तो वह शक्तिशाली और महापुरुषों की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है ॥ 64॥
 
"A brave man who is benefited by someone's kindness, repays the favor by doing something in return; however, if someone ignores the favor or forgets it and turns away from doing something in return, he hurts the feelings of powerful and great men." ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)