| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन » श्लोक 5 |
|
| | | | श्लोक 4.28.5  | संध्यारागोत्थितैस्ताम्रैरन्तेष्वपि च पाण्डुभि:।
स्निग्धैरभ्रपटच्छेदैर्बद्धव्रणमिवाम्बरम्॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘सन्ध्या की लालिमा के प्रकट होते ही, मध्य में लाल बादलों से आच्छादित तथा किनारों पर श्वेत एवं कोमल आकाश ऐसा प्रतीत होता है मानो उसने अपने घाव पर रक्त से सने श्वेत वस्त्र की पट्टी बाँध ली हो।॥5॥ | | | | ‘With the appearance of the redness of the evening, the sky, covered with red clouds in the centre and white and soft at the edges, appears as if it has tied a bandage of blood-stained white clothes on its wound.॥ 5॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|