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ramayan 4.28.49: ऊंचे पहाड़ों के अनेक झरने, जिनका वेग पर्वतीय चट्टानों पर गिरकर टूट गया है, मोरों की आवाज से गूंजती गुफाओं में टूटकर बिखरते हुए मोतियों के हार के समान प्रतीत होते हैं।   |   ramayan सर्ग 4.28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  4.28.49 
शैलोपलप्रस्खलमानवेगा:
शैलोत्तमानां विपुला: प्रपाता:।
गुहासु संनादितबर्हिणासु
हारा विकीर्यन्त इवावभान्ति॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
ऊंचे पहाड़ों के अनेक झरने, जिनका वेग पर्वतीय चट्टानों पर गिरकर टूट गया है, मोरों की आवाज से गूंजती गुफाओं में टूटकर बिखरते हुए मोतियों के हार के समान प्रतीत होते हैं।
 
The many waterfalls of the lofty mountains, whose momentum has been broken by falling on the mountain rocks, appear like necklaces of pearls breaking and scattering in the caves resounding with the call of peacocks.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)