| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन » श्लोक 32 |
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| | | | श्लोक 4.28.32  | मार्गानुग: शैलवनानुसारी
सम्प्रस्थितो मेघरवं निशम्य।
युद्धाभिकाम: प्रतिनादशङ्की
मत्तो गजेन्द्र: प्रतिसंनिवृत्त:॥ ३२॥ | | | | | | अनुवाद | | वह मदोन्मत्त हाथी, जो पर्वतीय वनों में विचरण कर रहा था तथा अपने प्रतिद्वन्द्वी से युद्ध करने की इच्छा रखता था, अपने मार्ग पर आगे बढ़ रहा था, और पीछे से बादलों की गर्जना सुनकर, यह सोचकर कि यह प्रतिद्वन्द्वी हाथी की गर्जना है, सहसा पीछे लौट गया। | | | | The intoxicated elephant, who was roaming in the mountain forests and desired to fight with his rival, was moving ahead on his own path, and on hearing the roar of the clouds from behind, fearing that it was the roar of the rival elephant, suddenly turned back. | | ✨ ai-generated | | |
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