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ramayan 4.28.14: सुमित्रानंदन! देखो, इस पर्वत की चोटियों पर खिले हुए कुटज के पुष्प कितने सुन्दर लग रहे हैं। कहीं वे पहली वर्षा के बाद भूमि से निकलती भाप से भरे हुए हैं, तो कहीं वर्षा के आगमन से अत्यंत उल्लासित (प्रफुल्लित) दिखाई दे रहे हैं। मैं अपने प्रियतम के वियोग के शोक से पीड़ित हूँ और ये कुटज के पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को प्रज्वलित कर रहे हैं॥14॥   |   ramayan सर्ग 4.28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.28.14 
क्वचिद् बाष्पाभिसंरुद्धान् वर्षागमसमुत्सुकान्।
कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु।
मम शोकाभिभूतस्य कामसंदीपनान् स्थितान्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानंदन! देखो, इस पर्वत की चोटियों पर खिले हुए कुटज के पुष्प कितने सुन्दर लग रहे हैं। कहीं वे पहली वर्षा के बाद भूमि से निकलती भाप से भरे हुए हैं, तो कहीं वर्षा के आगमन से अत्यंत उल्लासित (प्रफुल्लित) दिखाई दे रहे हैं। मैं अपने प्रियतम के वियोग के शोक से पीड़ित हूँ और ये कुटज के पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को प्रज्वलित कर रहे हैं॥14॥
 
Sumitra Nandan! See how beautiful the Kutja flowers blooming on the peaks of this mountain look. Somewhere they are filled with the steam coming out of the ground after the first rain and somewhere they look very excited (joyful) with the arrival of rain. I am suffering from the grief of separation from my beloved and these Kutja flowers are igniting the fire of my love.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)