श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 27: प्रस्रवणगिरि पर श्रीराम और लक्ष्मण की परस्पर बातचीत  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  4.27.18-19 
वानीरैस्तिमिदैश्चैव बकुलै: केतकैरपि।
हिन्तालैस्तिनिशैर्नीपैर्वेतसै: कृतमालकै:॥ १८॥
तीरजै: शोभिता भाति नानारूपैस्ततस्तत:।
वसनाभरणोपेता प्रमदेवाभ्यलंकृता॥ १९॥
 
 
अनुवाद
यह नदी, जो अपने तट पर जगह-जगह जलबाण, तिमिद, बकुल, केतक, हिन्तल, तिनिश, नीप, स्थलबाण, कृतमल (अमिलतास) आदि नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित है, वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित युवती के समान प्रतीत होती है॥18-19॥
 
This river, adorned here and there with various trees along its banks such as Jalban, Timid, Bakul, Ketak, Hintal, Tinish, Neep, Sthalban, Kritmal (Amiltas) etc., looks like a young woman adorned with clothes and jewellery.॥ 18-19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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