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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 26: हनुमान जी का सुग्रीव के अभिषेक के लिये श्रीरामचन्द्रजी से किष्किन्धा में पधारने की प्रार्थना, तत्पश्चात् सुग्रीव और अङ्गद का अभिषेक  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  4.26.31-32h 
ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।
प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते॥ ३१॥
प्राङ्मुखं विधिवन्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् रंग-बिरंगे पुष्पमालाओं से सुसज्जित एक सुन्दर मंच पर स्वर्ण सिंहासन रखकर उस पर सुन्दर पलंग बिछा दिया गया और सुग्रीव को उस पर पूर्वाभिमुख बैठाकर मंत्रोच्चार किया गया॥31 1/2॥
 
Thereafter, a golden throne was placed on a beautiful platform decorated with colorful flower garlands and a beautiful bed was spread on it and Sugriva was made to sit on it facing east while chanting the mantras. 31 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)