श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 25: श्रीराम का सुग्रीव, तारा और अङ्गद को समझाना तथा वाली के दाह-संस्कार के लिये आज्ञा प्रदान करना,अङ्गद के द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  4.25.50 
ततोऽग्निं विधिवद् दत्त्वा सोऽपसव्यं चकार ह।
पितरं दीर्घमध्वानं प्रस्थितं व्याकुलेन्द्रिय:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
फिर उन्होंने शास्त्रविधि के अनुसार उसमें अग्नि जलाकर उसकी परिक्रमा की। इसके बाद 'मेरे पिता लंबी यात्रा पर निकल गए हैं' ऐसा सोचकर अंगद की सारी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो गईं।
 
Then he lit a fire in it according to the scriptures and circumambulated it. After this, thinking that 'My father has set out on a long journey', all the senses of Angada became restless with grief. 50.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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