श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 25: श्रीराम का सुग्रीव, तारा और अङ्गद को समझाना तथा वाली के दाह-संस्कार के लिये आज्ञा प्रदान करना,अङ्गद के द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 39-40h
 
 
श्लोक  4.25.39-40h 
ततस्तारा पतिं दृष्ट्वा शिबिकातलशायिनम्॥ ३९॥
आरोप्याङ्के शिरस्तस्य विललाप सुदु:खिता।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् तारा ने शिबिका में पड़े हुए अपने पति के शव को देखकर उसका सिर गोद में ले लिया और अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी।
 
Thereafter Tara, seeing the corpse of her husband lying in the shibika, took his head in her lap and being very sad she began to lament.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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