श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.24.7 
श्रेयोऽद्य मन्ये मम शैलमुख्ये
तस्मिन् हि वासश्चिरमृष्यमूके।
यथा तथा वर्तयत: स्ववृत्त्या
नेमं निहत्य त्रिदिवस्य लाभ:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
आज मैं उस महान पर्वत ऋष्यमूक पर दीर्घकाल तक रहकर अपनी जाति के अनुसार किसी प्रकार जीविका चलाता हुआ रहना अपने लिए हितकर समझता हूँ; किन्तु यदि अपने इस भाई को मारकर मुझे स्वर्ग का राज्य भी मिल जाए, तो भी मैं उसे अपने लिए हितकर नहीं समझता॥ 7॥
 
Today I consider it to be beneficial for me to live for a long time on that great mountain Rishyamuka, while somehow earning my livelihood according to the nature of my caste; but even if I get the kingdom of heaven after killing this brother of mine, I do not consider it to be beneficial for me.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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