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ramayan 4.24.6: हे इक्ष्वाकुवंश के गौरव श्री रघुनाथ! मेरे भाई ने मेरा बहुत अपमान किया था, अतः क्रोध और क्षोभ के कारण मैंने पहले तो उसके वध की अनुमति दे दी थी; किन्तु अब वानरयोगी वालि के वध से मुझे अत्यन्त दुःख हो रहा है। कदाचित् यह दुःख जीवन भर मेरे साथ रहेगा।॥6॥   |   ramayan सर्ग 4.24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.24.6 
क्रोधादमर्षादतिविप्रधर्षाद्
भ्रातुर्वधो मेऽनुमत: पुरस्तात्।
हते त्विदानीं हरियूथपेऽस्मिन्
सुतीक्ष्णमिक्ष्वाकुवर प्रतप्स्ये॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे इक्ष्वाकुवंश के गौरव श्री रघुनाथ! मेरे भाई ने मेरा बहुत अपमान किया था, अतः क्रोध और क्षोभ के कारण मैंने पहले तो उसके वध की अनुमति दे दी थी; किन्तु अब वानरयोगी वालि के वध से मुझे अत्यन्त दुःख हो रहा है। कदाचित् यह दुःख जीवन भर मेरे साथ रहेगा।॥6॥
 
Shri Raghunath, the pride of the Ikshwaku clan! My brother had insulted me a lot, so out of anger and resentment I had earlier given permission for his killing; but now I am feeling very sad on the killing of the monkey-yogi Vali. Perhaps this sadness will remain with me for the rest of my life.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)