श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  4.24.37 
यच्चापि मन्येत भवान् महात्मा
स्त्रीघातदोषस्तु भवेन्न मह्यम्।
आत्मेयमस्येति हि मां जहि त्वं
न स्त्रीवध: स्यान्मनुजेन्द्रपुत्र॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
महाराजकुमार! आप महात्मा हैं, अतः यदि आप चाहते हैं कि मैं स्त्री-हत्या के पाप से मुक्त हो जाऊँ, तो यह समझकर कि यह वालि का जीव है, मुझे मार डालिए। इससे आपको स्त्री-हत्या का पाप नहीं लगेगा॥ 37॥
 
‘Maharajkumar! You are a great soul, so if you want me to be free from the sin of killing a woman, then kill me thinking that ‘this is the soul of Vali’. This way you will not commit the sin of killing a woman.॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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