श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.24.32 
त्वमात्तबाणासनबाणपाणि-
र्महाबल: संहननोपपन्न:।
मनुष्यदेहाभ्युदयं विहाय
दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्त:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
आपके हाथों में धनुष-बाण शोभायमान हैं। आपका बल महान है। आप बलवान शरीर से युक्त हैं और मनुष्य शरीर के सांसारिक सुखों को त्यागकर भी दिव्य शरीर की शोभा से युक्त हैं॥ 32॥
 
‘Your bow and arrow look beautiful in your hands. Your strength is great. You are blessed with a strong body and even after abandoning the worldly pleasures of a human body, you are blessed with the splendor of a divine body.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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