श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.24.31 
त्वमप्रमेयश्च दुरासदश्च
जितेन्द्रियश्चोत्तमधर्मकश्च।
अक्षीणकीर्तिश्च विचक्षणश्च
क्षितिक्षमावान् क्षतजोपमाक्ष:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'रघुनंदन! आप अपरिमेय हैं (देश, काल और वस्तु की सीमाओं से परे)। आपको पाना अत्यंत कठिन है। आप इन्द्रियों को वश में रखने वाले और उत्तम धर्म का पालन करने वाले हैं। आपका यश कभी नष्ट नहीं होता। आप पृथ्वी के समान दूरदर्शी और क्षमाशील हैं। आपके नेत्र किंचित लाल हैं॥ 31॥
 
‘Raghunandan! You are immeasurable (without the limits of place, time and object). It is very difficult to get you. You are the one who has controlled the senses and follow the best religion. Your fame never gets destroyed. You are farsighted and forgiving like the earth. Your eyes are slightly red.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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