श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.24.3 
स तं समासाद्य गृहीतचाप-
मुदात्तमाशीविषतुल्यबाणम्।
यशस्विनं लक्षणलक्षिताङ्ग-
मवस्थितं राघवमित्युवाच॥ ३॥
 
 
अनुवाद
सुग्रीव वहाँ धनुष धारण किए हुए खड़े श्री रघुनाथजी के पास गए, जो वीर स्वभाव के थे, जिनके बाण विषैले सर्पों के समान भयानक थे, जिनके प्रत्येक अंग सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार उत्तम लक्षणों से युक्त थे और जो अत्यंत यशस्वी थे, उन्होंने इस प्रकार कहा -॥3॥
 
Sugreeva went to Sri Raghunath who was standing there holding the bow, who had the nature of a brave hero, whose arrows were as dreadful as poisonous serpents, whose every limb was marked with excellent characteristics according to the Samudrika Shastra and who was extremely famous and spoke thus -॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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