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ramayan 4.24.25: श्री रघुनाथजी पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं और सम्पूर्ण जगत की रक्षा करते हैं। उस समय वे अत्यन्त कुतूहलवश बार-बार इधर-उधर देखने लगे, तब उन्होंने शोक से व्याकुल तारा को देखा, जो अपने स्वामी के लिए विलाप कर रही थी॥ 25॥   |   ramayan सर्ग 4.24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.24.25 
तस्मिन् क्षणेऽभीक्ष्णमवेक्षमाण:
क्षितिक्षमावान् भुवनस्य गोप्ता।
रामो रुदन्तीं व्यसने निमग्नां
समुत्सुक: सोऽथ ददर्श ताराम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
श्री रघुनाथजी पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं और सम्पूर्ण जगत की रक्षा करते हैं। उस समय वे अत्यन्त कुतूहलवश बार-बार इधर-उधर देखने लगे, तब उन्होंने शोक से व्याकुल तारा को देखा, जो अपने स्वामी के लिए विलाप कर रही थी॥ 25॥
 
Sri Raghunathji is as forgiving as the earth and protects the whole world. At that time, he became very curious and looked around repeatedly, then he saw the grief-stricken Tara, who was crying for her master.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)