Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 4.24.18: हे मनुष्यों के स्वामी! हे रघुनन्दन! मैंने जो घोर पाप किया है, वह मेरे हृदय में स्थित पुण्य को नष्ट कर रहा है। जैसे अग्नि में तपा हुआ अशुद्ध सोना अपने भीतर के मल को नष्ट कर देता है॥18॥   |   ramayan सर्ग 4.24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.24.18 
अंहो बतेदं नृवराविषह्यं
निवर्तते मे हृदि साधुवृत्तम्।
अग्नौ विवर्णं परितप्यमानं
किट्टं यथा राघव जातरूपम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! हे रघुनन्दन! मैंने जो घोर पाप किया है, वह मेरे हृदय में स्थित पुण्य को नष्ट कर रहा है। जैसे अग्नि में तपा हुआ अशुद्ध सोना अपने भीतर के मल को नष्ट कर देता है॥18॥
 
O Lord of men! O son of Raghunandan! The terrible sin that I have committed is destroying the virtue in my heart. Just like the impure gold heated in fire destroys the impurities within it.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)