श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.24.17 
सोदर्यघातापरगात्रवाल:
संतापहस्ताक्षिशिरोविषाण:।
एनोमयो मामभिहन्ति हस्ती
दृप्तो नदीकूलमिव प्रवृद्ध:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वह महान पापी, मतवाला हाथी, जिसका पिछला भाग और पूँछ उसके भाई के वध के कारण हैं तथा जिसकी सूँड़, आँखें, सिर और दाँत उससे उत्पन्न होने वाले दुःख हैं, नदी के तट के समान मुझ पर आक्रमण कर रहा है॥ 17॥
 
That great sinful, intoxicated elephant, whose rear part and tail are the killing of his brother and whose trunk, eyes, head and teeth are the anguish resulting from it, is attacking me like a riverbank.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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