श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.24.15 
नार्हामि सम्मानमिमं प्रजानां
न यौवराज्यं कुत एव राज्यम्।
अधर्मयुक्तं कुलनाशयुक्त-
मेवंविधं राघव कर्म कृत्वा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'रघुनाथजी! कुल का नाश करने वाला ऐसा पापकर्म करके मैं अब प्रजा के आदर के योग्य नहीं रहा। राज्य पाने की तो बात ही छोड़ो, मैं युवराज बनने के भी योग्य नहीं रहा॥ 15॥
 
‘Raghunathji! By committing such a sinful act that ruins my family, I am no longer worthy of the people's respect. Forget about getting the kingdom, I am not even worthy of being the crown prince.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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