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श्लोक 4.24.14  |
पाप्मानमिन्द्रस्य मही जलं च
वृक्षाश्च कामं जगृहु: स्त्रियश्च।
को नाम पाप्मानमिमं सहेत
शाखामृगस्य प्रतिपत्तुमिच्छेत्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियाँ इन्द्र के पापों को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं; किन्तु मुझ जैसे वानर के पापों को कौन स्वीकार करना चाहेगा? अथवा कौन उन्हें स्वीकार कर सकेगा?॥14॥ |
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| The earth, water, trees and women willingly accepted the sins of Indra; but who would want to accept the sins of a monkey like me? Or who will be able to accept them?॥ 14॥ |
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