| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 24: सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना » श्लोक 13 |
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| | | | श्लोक 4.24.13  | अचिन्तनीयं परिवर्जनीय-
मनीप्सनीयं स्वनवेक्षणीयम्।
प्राप्तोऽस्मि पाप्मानमिदं वयस्य
भ्रातुर्वधात् त्वाष्ट्रवधादिवेन्द्र:॥ १३॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘मित्र! जैसे वृत्रासुर को मारकर इन्द्र पाप के भागी हुए थे, वैसे ही अपने भाई को मारकर मैं भी ऐसे पाप का भागी हूँ, जिसका विचार करना तो दूर, करना भी अनुचित है। वह सर्वथा अस्वीकार्य, अवांछनीय तथा श्रेष्ठ पुरुषों के देखने के भी योग्य नहीं है॥13॥ | | | | ‘Friend! Just as Indra was guilty of sin by killing Vritraasura, similarly, by killing my brother, I am guilty of such a sin which is inappropriate to even think about, let alone do. It is completely unacceptable, undesirable and unworthy of even being seen by the best men.॥ 13॥ | | ✨ ai-generated | | |
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