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श्लोक 4.24.11  |
द्रुमशाखावभग्नोऽहं मुहूर्तं परिनिष्टनन्।
सान्त्वयित्वा त्वनेनोक्तो न पुन: कर्तुमर्हसि॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| जब वालि ने मुझे वृक्ष की एक शाखा से घायल कर दिया और मैं दो घण्टे तक कराहता रहा, तब उसने मुझे सान्त्वना देते हुए कहा - 'जाओ, मुझसे फिर युद्ध करने की इच्छा मत करो।'॥11॥ |
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| When Vali injured me with a branch of a tree and I was groaning for two hours, then he consoled me and said - 'Go, do not wish to fight with me again.'॥ 11॥ |
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