श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 23: तारा का विलाप  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  4.23.24-25h 
एवमुक्त: समुत्थाय जग्राह चरणौ पितु:॥ २४॥
भुजाभ्यां पीनवृत्ताभ्यामङ्गदोऽहमिति ब्रुवन्।
 
 
अनुवाद
माता की यह बात सुनकर अंगद उठा और अपनी मोटी-मोटी गोल भुजाओं से पिता के चरण पकड़ लिए और उन्हें प्रणाम करते हुए बोला, "पिताजी! मैं अंगद हूँ।"
 
On hearing his mother say this, Angad got up and held his father's feet with his thick and round arms and said while bowing to him, "Father! I am Angad."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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