श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 23: तारा का विलाप  »  श्लोक 19-20h
 
 
श्लोक  4.23.19-20h 
पेतु: क्षतजधारास्तु व्रणेभ्यस्तस्य सर्वश:॥ १९॥
ताम्रगैरिकसम्पृक्ता धारा इव धराधरात्।
 
 
अनुवाद
बाण के निकल जाने पर वालि के शरीर के सब घावों से रक्त की धाराएँ बहने लगीं, मानो किसी पर्वत से लाल गेरू मिले जल की धाराएँ बह रही हों ॥19 1/2॥
 
When the arrow was removed, streams of blood began to flow from all the wounds on Vali's body, as if streams of water mixed with red ochre were flowing from a mountain. ॥19 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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