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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 23: तारा का विलाप  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  4.23.17-18h 
उद्बबर्ह शरं नीलस्तस्य गात्रगतं तदा॥ १७॥
गिरिगह्वरसंलीनं दीप्तमाशीविषं यथा।
 
 
अनुवाद
उस समय उस नीली आंखों वाली स्त्री के शरीर में लगा हुआ बाण ऐसे निकाला गया, मानो किसी पर्वत की गुफा में छिपे हुए प्रज्वलित मुख वाले विषधर सर्प को निकाल लिया गया हो।
 
At that time the arrow stuck in the body of the blue-eyed woman was pulled out as if a blazing mouthed poisonous serpent had been pulled out from a cave hidden in a mountain. 17 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)