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ramayan 4.21.7: उसने नीति के अनुसार राज्यकार्य किया है। उसने समय पर शांति, दान और क्षमा का आचरण किया है। अतः वह धर्मानुसार प्राप्त होने वाले लोक में चला गया है। उसके लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए॥ 7॥   |   ramayan सर्ग 4.21: हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 21: हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.21.7 
यदयं न्यायदृष्टार्थ: सामदानक्षमापर:।
गतो धर्मजितां भूमिं नैनं शोचितुमर्हसि॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उसने नीति के अनुसार राज्यकार्य किया है। उसने समय पर शांति, दान और क्षमा का आचरण किया है। अतः वह धर्मानुसार प्राप्त होने वाले लोक में चला गया है। उसके लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए॥ 7॥
 
‘He has conducted the state affairs according to the ethics. He has been practicing peace, charity and forgiveness at the right time. Therefore, he has gone to the world that is attained according to Dharma. You should not grieve for him.॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)