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ramayan 4.21.14: मैं न तो वानरों के राज्य की स्वामिनी हूँ और न अंगद के लिए कुछ करने का अधिकार रखती हूँ। उसके चाचा सुग्रीव ही सब कार्य करने में समर्थ हैं और वे मुझसे भी अधिक उसके निकट हैं।॥14॥   |   ramayan सर्ग 4.21: हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 21: हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.21.14 
न चाहं हरिराज्यस्य प्रभवाम्यङ्गदस्य वा।
पितृव्यस्तस्य सुग्रीव: सर्वकार्येष्वनन्तर:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
मैं न तो वानरों के राज्य की स्वामिनी हूँ और न अंगद के लिए कुछ करने का अधिकार रखती हूँ। उसके चाचा सुग्रीव ही सब कार्य करने में समर्थ हैं और वे मुझसे भी अधिक उसके निकट हैं।॥14॥
 
‘I am neither the mistress of the kingdom of the monkeys nor do I have the right to do anything for Angad. His uncle Sugreeva is capable of doing all the tasks and he is also closer to him than me.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)