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ramayan 4.21.13: एक ओर तो अंगद के समान सौ पुत्रों का होना, और दूसरी ओर इस वीर स्वामी को मरकर भी गले लगाना, सती होना - इन दोनों में से अपने वीर पति के शरीर को गले लगाना मुझे श्रेष्ठ प्रतीत होता है ॥13॥   |   ramayan सर्ग 4.21: हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 21: हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.21.13 
अङ्गदप्रतिरूपाणां पुत्राणामेकत: शतम्।
हतस्याप्यस्य वीरस्य गात्रसंश्लेषणं वरम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
एक ओर तो अंगद के समान सौ पुत्रों का होना, और दूसरी ओर इस वीर स्वामी को मरकर भी गले लगाना, सती होना - इन दोनों में से अपने वीर पति के शरीर को गले लगाना मुझे श्रेष्ठ प्रतीत होता है ॥13॥
 
On the one hand, having a hundred sons like Angad, and on the other hand, embracing this brave master even after his death, committing sati - out of these two, embracing the body of my brave husband seems to me to be the best. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)