श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 2: सुग्रीव तथा वानरों की आशङ्का, हनुमान्जी द्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीव का हनुमान जी को श्रीराम-लक्ष्मण के पास उनका भेद लेने के लिये भेजना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.2.3 
नैव चक्रे मन: स्थातुं वीक्षमाणौ महाबलौ।
कपे: परमभीतस्य चित्तं व्यवससाद ह॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पराक्रमी राम और लक्ष्मण को देखकर सुग्रीव अपना मन स्थिर न रख सके। उस समय वानरराज अत्यंत भयभीत और दुःखी हो गए।
 
Seeing the mighty Rama and Lakshmana, Sugreeva could not keep his mind steady. At that time the monkey king was extremely frightened and became very sad.
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