श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 2: सुग्रीव तथा वानरों की आशङ्का, हनुमान्जी द्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीव का हनुमान जी को श्रीराम-लक्ष्मण के पास उनका भेद लेने के लिये भेजना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.2.25 
लक्षयस्व तयोर्भावं प्रहृष्टमनसौ यदि।
विश्वासयन् प्रशंसाभिरिङ्गितैश्च पुन: पुन:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उनके भावों को समझो। यदि वे प्रसन्न दिखाई दें, तो बार-बार मेरी स्तुति करके तथा मेरे भावों को प्रकट करने वाले कार्यों द्वारा उनका मुझ पर विश्वास जगाओ॥ 25॥
 
‘Understand their feelings. If they seem to be happy, then build their trust in me by praising me repeatedly and by actions that indicate my intentions.॥ 25॥
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