श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 2: सुग्रीव तथा वानरों की आशङ्का, हनुमान्जी द्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीव का हनुमान जी को श्रीराम-लक्ष्मण के पास उनका भेद लेने के लिये भेजना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.2.15 
यस्मादुद्विग्नचेतास्त्वं विद्रुतो हरिपुङ्गव।
तं क्रूरदर्शनं क्रूरं नेह पश्यामि वालिनम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे वानरों के सरदार! मैं यहाँ उस क्रूर और निर्दयी स्त्री को नहीं देख रहा हूँ जिससे तुम संकट में पड़कर भागे हो॥15॥
 
O head of monkeys! I do not see here that cruel and ruthless woman from whom you have fled in distress.॥ 15॥
 ✨ ai-generated