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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 19: अङ्गद सहित तारा का भागे हुए वानरों से बात करके वाली के समीप आना और उसकी दुर्दशा देखकर रोना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  4.19.22-23 
क्षेप्तारं पर्वतेन्द्राणां वज्राणामिव वासवम्।
महावातसमाविष्टं महामेघौघनि:स्वनम्॥ २२॥
शक्रतुल्यपराक्रान्तं वृष्ट्वेवोपरतं घनम्।
नर्दन्तं नर्दतां भीमं शूरं शूरेण पातितम्।
शार्दूलेनामिषस्यार्थे मृगराजमिवाहतम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो इन्द्र के समान युद्धस्थल में विशाल पर्वतों को गिरा देने वाले, प्रचण्ड तूफान के समान वेगवान, जिनकी गर्जना से विशाल मेघों का भी घोर गर्जन तुच्छ हो जाता था और जो इन्द्र के समान पराक्रमी थे, वे अब वर्षा के पश्चात शान्त हुए मेघ के समान कार्य करना छोड़ चुके हैं। जो स्वयं गर्जना करके गर्जने वाले योद्धाओं के हृदय में भय उत्पन्न करते थे, वे एक के बाद एक वीर योद्धाओं द्वारा मारे जा रहे हैं। जैसे एक सिंह दूसरे सिंह को मांस के लिए मार डालता है, वैसे ही ये दोनों राज्य के हित के लिए अपने ही भाई के द्वारा मारे गए हैं॥22-23॥
 
Those who, like Indra who used to throw down huge mountains on the battlefield, whose speed was like that of a fierce storm, whose roar made the deep roar of the great clouds contemptible and who were as valiant as Indra, have now stopped from action like a cloud which has calmed down after rain. Those who themselves roared and instilled fear in the hearts of the roaring warriors, have been killed by one brave warrior after another. Just as one lion kills another lion for meat, similarly, for the sake of the kingdom, these two have been killed by their own brother.॥22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)