श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  4.18.65 
स तस्य वाक्यं मधुरं महात्मन:
समाहितं धर्मपथानुवर्तितम्।
निशम्य रामस्य रणावमर्दिनो
वच: सुयुक्तं निजगाद वानर:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
युद्ध में शत्रुओं को नम्र करने वाले, धर्ममार्ग के अनुकूल तथा मन के संशय का समाधान करने वाले महात्मा श्री रामजी के मधुर वचन सुनकर उस वानर-बालिका ने ये सुन्दर एवं युक्तिसंगत वचन कहे-॥65॥
 
Hearing the sweet words of the great soul Shri Ram, who humbled the enemy in the war, and which were in accordance with the path of religion and which resolved the mental doubts, the monkey lady said these beautiful and logical words -॥ 65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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