श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  4.18.62 
तद् भवान् दण्डसंयोगादस्माद् विगतकल्मष:।
गत: स्वां प्रकृतिं धर्म्यां दण्डदिष्टेन वर्त्मना॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
इस दण्ड को पाकर तुम पाप से मुक्त हो गए और इस दण्ड का विधान करने वाले शास्त्रों के अनुसार दण्ड को स्वीकार करने के मार्ग का अनुसरण करके तुमने धर्मानुसार शुद्ध स्वरूप को प्राप्त किया ॥62॥
 
After receiving this punishment, you became free from sin and by following the path of accepting the punishment as prescribed by the scriptures that prescribed this punishment, you attained the pure form as per the religion. 62॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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