श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 57-58h
 
 
श्लोक  4.18.57-58h 
त्वत्तोऽहं वधमाकांक्षन् वार्यमाणोऽपि तारया॥ ५७॥
सुग्रीवेण सह भ्रात्रा द्वन्द्वयुद्धमुपागत:।
 
 
अनुवाद
मैं तुम्हारे हाथों मारा जाना चाहता था; इसीलिए तारा के मना करने पर भी मैं अपने भाई सुग्रीव के साथ द्वन्द्वयुद्ध करने आया हूँ।’ 57 1/2
 
I wanted to be killed by your hands; that is why in spite of Tara's refusal I came to fight a duel with my brother Sugreeva.' 57 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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