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ramayan 4.18.56-57h: 'सुग्रीव, आपकी कृपा से ही मैं इस राज्य का वास्तविक रूप से शासन कर सकता हूँ। जो मनुष्य आपके वश में है और आपके मन का अनुसरण करता है, वह स्वर्ग और पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर सकता है और उसका सुचारु रूप से शासन कर सकता है।'   |   ramayan सर्ग 4.18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 56-57h
 
 
श्लोक  4.18.56-57h 
त्वया ह्यनुगृहीतेन शक्यं राज्यमुपासितुम्।
त्वद्वशे वर्तमानेन तव चित्तानुवर्तिना॥ ५६॥
शक्यं दिवं चार्जयितुं वसुधां चापि शासितुम्।
 
 
अनुवाद
'सुग्रीव, आपकी कृपा से ही मैं इस राज्य का वास्तविक रूप से शासन कर सकता हूँ। जो मनुष्य आपके वश में है और आपके मन का अनुसरण करता है, वह स्वर्ग और पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर सकता है और उसका सुचारु रूप से शासन कर सकता है।'
 
‘Sugreeva, only by being blessed by you can rule this kingdom in its true form. A man who is under your control and follows your mind can obtain the kingdom of heaven and earth and can rule it well. 56 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)