श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.18.55 
मद्दोषकृतदोषां तां यथा तारां तपस्विनीम्।
सुग्रीवो नावमन्येत तथावस्थातुमर्हसि॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
बेचारी तारा बड़ी दयनीय दशा में है। कृपया ऐसा प्रबन्ध कीजिए कि सुग्रीव मेरे अपराध के कारण उसे दोषी न समझकर उसका तिरस्कार न करने लगे।
 
Poor Tara is in a very pitiable condition. Please make arrangements so that Sugreeva does not consider her guilty and despise her because of my crime.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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