श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  4.18.54 
या ते नरपते वृत्तिर्भरते लक्ष्मणे च या।
सुग्रीवे चाङ्गदे राजंस्तां चिन्तयितुमर्हसि॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
राजा! नरेश! जैसा व्यवहार आप भरत और लक्ष्मण के प्रति करते हैं, वैसा ही व्यवहार आपको सुग्रीव और अंगद के प्रति भी करना चाहिए। आप उन दोनों का समान भाव से स्मरण करें। 54॥
 
King! Nareshwar! The way you behave towards Bharat and Lakshman, you should also behave towards Sugriva and Angad. You should remember both of them in the same spirit. 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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