श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  4.18.53 
सुग्रीवे चाङ्गदे चैव विधत्स्व मतिमुत्तमाम्।
त्वं हि गोप्ता च शास्ता च कार्याकार्यविधौ स्थित:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें सुग्रीव और अंगद दोनों के प्रति शुभ कामना रखनी चाहिए। अब तुम ही इन लोगों के रक्षक हो और इन्हें उचित-अनुचित का ज्ञान देने वाले हो।' 53
 
You should have good wishes for both Sugreeva and Angad. Now you are the protector of these people and the one who will teach them what is right and what is wrong.' 53
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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